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क्यों घट रही कच्चे तेल की कीमत? भारत के लिए कच्चा तेल 100 डॉलर से ऊपर जाने के क्या हैं मायने?

रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते इस महीने की शुरुआत में कच्चा तेल 140 डॉलर प्रति बैरल के पास चला गया था। 16 मार्च को यह 99.32 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था।वहीं, इस बीच  रूस और यूक्रेन के बीच शांति वार्ता सकारात्मक रूप से चल रही है।

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चीन में कोरोना के फिर पांव पसारने से कई शहरों में लॉकडाउन लगाया गया है, जिससे कच्चे तेल की मांग में कमी आई है। अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों ने ओपेक देशों के कच्चे तेल का उत्पादन बढ़ाने का आग्रह किया है। ईरान और वेनेजुएला से भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की आपूर्ति बढ़ने की उम्मीद जगी है।

कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के पार रहती है तो क्या होगा?

उपभोक्ता लागत: 2014 से 2020 तक कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट के चलते थोक महंगाई दर पांच प्रतिशत के आसपास बनी हुई थी। 2020 के मध्य में कच्चे तेल की कीमतों में उछाल के साथ थोक महंगाई 10 प्रतिशत के करीब पहुंच गई। मार्च 2020 से फरवरी 2022 के दौरान थोक महंगाई 20 प्रतिशत बढ़ी है, जबकि तेल और ऊर्जा कमोडिटी की कीमतों में 40 प्रतिशत की वृद्धि रही है। ऐसे में यदि कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के पार रहती है तो आने वाले दिनों में उपभोक्ता लागत में बढ़ोतरी होगी।

सब्सिडी में कटौती

 2014 से पहले तक केंद्र सरकार पेट्रोलियम उत्पादों की सब्सिडी पर भारी-भरकम खर्च करती थी। 2012-13 में सब्सिडी पर सबसे ज्यादा 1.64 लाख करोड़ रुपये खर्च किए गए। 2014 में पेट्रोलियम उत्पादों को बाजार के हवाले कर दिया गया।

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इससे सरकार के सब्सिडी खर्च में कमी आई। 2019-20 में सरकार ने पेट्रोलियम उत्पादों की सब्सिडी पर 266 अरब रुपये खर्च किए। यदि कच्चे तेल की कीमतों में अचानक उछाल आता है तो सरकार सब्सिडी को खत्म करके इसका बोझ उपभोक्ताओं पर डाल सकती है। ऐसा होने पर पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमतों में भारी बढ़ोतरी होगी।

वित्तीय प्रबंधन में समस्या

2014-15 में भाजपा नीत गठबंधन की सरकार बनने के समय कच्चे तेल की कीमतें काफी कम स्तर पर थीं। लेकिन सरकार ने पेट्रोल-डीजल की कीमतों में इसके अनुरूप कटौती नहीं की। इस कदम से सरकार को ज्यादा राजस्व मिला और वित्तीय घाटे पर काबू पाने में मदद मिली। वित्त वर्ष 2020-21 में सरकार को पेट्रोलियम उत्पादों पर कर से 4.6 लाख करोड़ रुपये का राजस्व मिला जो 2013-14 के मुकाबले तीन गुना ज्यादा था। अब यदि कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार बनी रहती हैं तो सरकार को घरेलू स्तर पर कीमतों पर काबू बनाए रखने के लिए टैक्स में कटौती करनी पड़ेगी। इससे राजस्व संग्रह में कमी आएगी। यदि ऐसा होता है तो सरकार को विकास से जुड़े कार्यों के लिए बाहर से धन जुटाना पड़ेगा, जिससे वित्तीय प्रबंधन में समस्या हो सकती है।

 

रूस से कच्चे तेल की खरीद का रास्ता साफ

अमेरिका ने भारत के लिए रूस के कच्चे तेल की खरीद का रास्ता साफ कर दिया है। अमेरिका ने कहा है कि उसे भारत के रूस से कच्चा तेल खरीदने पर कोई आपत्ति नहीं है। इससे रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों का उल्लंघन नहीं होगा। हालांकि, अमेरिका ने कहा है कि इसकी आड़ में भारत युद्ध में रूस की मदद नहीं कर सकता है। साथ ही अमेरिका ने कहा है कि भारत रूस से कम कीमत पर भी कच्चा तेल खरीद सकता है।

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